Tuesday, 21 January 2014

दो राहों का मिलन



छोटी बड़ी गाड़ियों की भागा दौड़। पैदल चलने वालों की आवाजाही। जानवरों की चहलकदमी। बच्चों के मासूम कदमों की सरसराहट। पेड़ से गिरे पत्ते तो कहीं पूरे खड़े पेड़। कहीं लाल, पीली, हरी बत्ती के सिग्नल, तो राहगीरों के लिए जेब्रा क्रासिंग। कुछ यही तस्वीर है राहों की। राह जो हमें एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाती हैं। कहने को राह लेकिन जिंदगानी का अहम हिस्सा। यही राहें देती हैं हमें जिंदगी का फलसफा। तभी तो कहते हैं कि जिंदगी की राह नहीं आसान। पर यहां बात दो राहों की।
वो राहें जो एक दूसरे से मिलना चाहती हैं। हमेशा बात करती हैं। अपने सुख-दुख की, अपने जज्बातों की, अपने जेहन में आने वाले ख्यालों की। हमेशा जुदा, पर जुदा होकर भी एक। चलिए मान लेते हैं ये राहें हैं जयपुर से दिल्ली जाने वाली और दिल्ली से जयपुर आने वाली। दोनों एक दूसरे के अगल-बगल, पर एक दूसरे से उलट। साथ न होते हुए भी एक दूसरे का कभी नहीं छोड़ती साथ। 
लेकिन बातों में वही बात, कैसे चलें एक साथ। कैसे मिलें एक दूसरे से। 
फिर उन्हें सूझी एक तरकीब। क्यों न पूछें किसी से कैसे हो हमारी मुलाकात। जाते हुए एक महात्मा जी को रोका और उनसे मन का सवाल पूछा। महात्मा जी ने सवाल को सही से समझा। फिर आगे-पीछे देखा। मामला समझ में आया और फिर समस्या को सुलझाया। बोले- दोनों राहों से, बीच में खड़े होकर न करो बात। थोड़ा आगे बढ़ो, मिलेगा एक चौराहा, वो मोड़ जहां होगा तुम्हारा मिलन। दोनों राहों का दिमाग चकरा गया। इतना आसान सा तरीका, उन्हें पहले समझ में क्यों नहीं आया। दोनों आगे बढ़ीं, चौराहे पर मिली। सुकून मिला। दिल भी हुआ शांत। तय किया कि बातों से नहीं आगे बढ़ने से ही मिलती है मंजिल। वो भी बस आसानी और साफ दिल से सोचकर।
इन्हीं दो राहों की तरह कई लोग भी बस मिलने और मंजिल तक जाने की बातें करते हैं, आगे नहीं बढ़ते। आगे बढ़िए क्योंकि हर चौराहे से चार नए रास्ते खुलते हैं। जो चार नई मंजिलों को निकलते हैं।

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